शर-शय्या पर भीष्म का द्वंद्व

लो अब मैं शर-शय्या पर आ गया और मृत्यु के लिए भी शुभ घड़ी की प्रतीक्षा करनी पड़ रही है। मेरे जीवन में कुटिल ग्रहों की चाल कुछ ऐसी रही कि जीवन भर मैं विकल रहा, जबकि पूरी निष्ठा से, संपूर्ण प्रतिबद्धता से, अटूट ईमानदारी से जीवन को मैंने भरपूर जिया और सांसों की एक-एक डोर को मैंने संकल्पबद्ध चलाया। अब सूर्य नारायण उत्तरायण हों, तब तो मैं इस धरती व इस देह से विदा लूं।
मैं एक सम्राट के पुत्र के रूप में जन्म लेकर इस धरती पर आया, किंतु स्वयं के चेत आने तक मैं मां के आंचल की छाया से वंचित हो गया। न जाने क्या मेरे माता-पिता के दांपत्य जीवन में द्वंद्व, तर्क व शर्त की रस्सी बंधी थी कि पिता के एक टोक व एक रोक से मां, पिता को छोड़कर चली गयी और मैं गंगा मां का पुत्र देवव्रत पूर्णतया एकाकी हो गया और राजसभा के हलचल से नितांत उदासीन।
अपनी आसक्ति व पराक्रमयुक्त सांसारिक जीवन से भरे व एषणा से लबालब मेरे पिता, मेरी निस्संगता भरे जीवन से पूर्णतया तटस्थ रहे और निरंतर अपनी ही दुनिया में खोये रहे व मस्त रहे।
फिर एक ऐसी घटना घट गयी कि मेरा जीवन एक नया मोड़ ही ले लिया, जो पूर्णतया नया, परिवेश से भिन्न और असंभव जैसे कठिनाई से भरा हुआ था, जिसे मुझे साधना पड़ा। और, साधते-साधते इस वृद्ध वय में शर-शय्या पर आ जाना पड़ा। जब मैं अपने युवाकाल की डाल पर पहुंचा, तभी मेरे प्रौढ़ व विधुर जैसे पिता को मत्स्य कन्या नाम से विख्यात एक केवट पुत्री भा गयी और उसके सौंदर्य के आकर्षण से बंधे मेरे सम्राट पिता उससे व उसके पिता से न केवल प्रणय निवेदन स्वीकार करने का आग्रह किया, बथ्लक उस किशोरी कन्या से ब्याह का प्रस्ताव भी दे दिया और अपनी रानी यानी साम्राज्ञी बनाने का वचन भी। मस्तिष्क से तीव्र उस चतुर केवट ने इस प्रस्ताव के बदले मेरे पिता को एक शर्त में बांध दिया कि मेरी पुत्री का पुत्र ही आगे आपकी राज्य सत्ता का उत्तराधिकारी होगा। इतना ही नहीं, उनके उत्तराधिकारी भी कालांतर में, यानी आगामी पीढ़ियों वाले भविष्य में इस राज्य सत्ता के हकदार न होंगे और मेरी पुत्री से जन्मी व बढ़ी बढ़ी पीढ़ियां ही आपके कुरू साम्राज्य के स्वाभाविक उत्तराधिकारी होंगी। और भी कि, देवव्रत सहित इनकी आगामी पीढ़ी भी मेरी पुत्री के पुत्रों व उनकी पीढ़ियों के सम्राटत्व की सेवा व रक्षा करेगी और पूरी निष्ठा, शक्ति, ईमानदारी व प्रतिबद्धता से इस साम्राज्य का साथ देगी।
तृष्णा से भरे मेरे पिता इन शर्ताें को सुनते ही द्वंद्व में पड़ गये, किंतु साहसिक निर्णय नहीं ले सके और उस केवट पुत्री के सौंदर्य के आकर्षण व मोह से अपने को मुक्त नहीं कर सके। तभी मैंने अपने पिता को द्वंद्व से मुक्त करने व उन्हें सुखी व तृप्त देखने के लिए एक साहसिक व अद्भुत निर्णय किया व अपने पिता, उस केवट व उसकी पुत्री के समक्ष ही यह भीषण प्रतिज्ञा कर ली कि मैं जीवन भर कुंवारा ही रहूंगा, ब्याह नहीं करूंगा, निरंतर ब्रह्मचर्य का पालन करूंगा, जीवन को साधता रहूंगा और पूरी निष्ठा से इस साम्राज्य की रक्षा, सेवा व विकास करता रहूंगा। पूरे समर्पण भाव से साम्राज्य के प्रति समर्पित हो जाऊंगा, चाहे राजा कोई भी हो और उसका उचित-अनुचित जो भी आदेश हो, उसको पूरा करना व करते रहना मेरा संकल्प है व रहेगा। तभी वह केवट पुत्री मेरी विमाता बनकर कुरू दुर्ग में आयी व सत्यवती नाम से प्रसिद्ध हो गयी।
फिर इसी प्रतिज्ञा को निभाते-निभाते व इस संकल्प को साधते-साधते पूरा जीवन व्यतीत कर आज इस शर-शय्या पर आ गया और प्रकृति द्वारा दी गयी इतनी क्षमता व पराक्रम के उपरांत भी मेरा जीवन रिक्त का रिक्त ही रह गया। मैं इसी संकल्प से बंध साम्राज्य सत्ता व उसके तत्कालीन वास्तविक प्रतिनिधि विमाता के आदेश से ब्रह्मचर्य पालन की प्रतिज्ञा से लैस होकर भी अपने सौतेले भाईयों के लिए अंब व अंबालिका का अपहरण करके ले आया, किंतु मेरा सौतेला भाई विचित्रवीर्य नपुंसक था और एक भाई चित्रांगद इस हरण के कुछ ही दिन बाद युद्ध में हत हो चुका था। इन दोनों लड़कियों यानी राजपुत्रियों के कोप का शिकार भी मैं कई बार हुआ, विशेषकर जब अंबा के प्रणय-निवेदन को अपनी प्रतिज्ञा व ब्रह्मचर्य व्रत का हवाला देकर मैंने ठुकरा दिया। वह नागिन की तरह मुझ पर फुंफकार उठी थी। इसी संकल्प से बंधा मैं विमाता के आदेश से कुरूवंश को आज बढ़ाने के निमित्त व्यास को लाया और तब मेरे दो भतीजे धृतराष्टÑ व पांडु जन्में, जिसमें पहला अंधा हुआ व दूसरा पीलिया का रोगी। ज्यों-त्यों करके उनका भी ब्याह रचाया और ज्यों-त्यों करके ही फिर आगे का वंश बढ़वाया। और, जब पांच पांडव व सौ कौरव इस वंश में हो गये, तो तमाम शिक्षा-दीक्षा व संस्कार दिलाने के बावजूद इनके बीच वैर, विरोध व विग्रह को मैं हटा न सका। तभी तो इतना बड़ा, विश्वयुद्ध जैसा महाभारत का युद्ध हो गया, जिसमें लड़ाई की धरती रक्त से नीचे कोस भर लाल हो गयी और करोड़ों लोग मारे गये। और, वह भी किसलिए? महज एक परिवार के दो पक्षों के बीच साम्राज्य वितरण के निमित्त। इस पूरे युद्ध प्रसंग में मैं सबकुछ जानते-समझते हुए भी अपने संकल्प से बंधे होने के कारण अन्यायी पक्ष का साथ देने को विवश हुआ और असीम पराक्रम के बावजूद पराजय का भी घाव झेला। अपनी वैयक्तिक सात्विकता व जीवन के प्रति एक ईमानदार निष्ठा, तेजस्विता व प्रतिबद्धता के बावजूद स्वयं को काला कर लिया। इसी संकल्प के कारण भरी राजसभा में द्रौपदी को नग्न करने व उस कुत्सित चीरहरण के आदेश के विरुद्ध मैं खून का घूंट पीकर भी खड़ा नहीं हो पाया, जबकि भीतर क्रोध की अग्नि व उसकी चिंगारी पूरी चेतना को एक खौलती कड़ाह में डाल दी थी। इसी संकल्प ने दो-दो बार हुए उस निकृष्ट जुए के खेल का भी विरोध नहीं करने दिया, जिसके कुफल के रूप में पांडवों को वनवास का भारी कष्ट झेलना पड़ा, फिर अज्ञातवास का। इसी प्रतिज्ञा ने लाक्षागृह के निर्माण के षड्यंत्र के विरुद्ध भी खड़ा नहीं होने दिया। मनुष्य से न्याय चुरानेवाले पापियों को मैं दंडित व दमित नहीं कर सका, न उन्हें रोक सका, इसी संकल्प के कारण। जबकि इनको धूल चटा देने की असीम शक्ति मुझ अकेले के पास थी और प्रकृति प्रदत्त पराक्रम अन्याय की सेवा की भेंट चढ़ गया।
आज जब मैं जीवन के अंत में अपना मूल्यांकन कर रहा हूं और मृत्यु की घड़ियों की आहट वाली टक-टक साफ सुनाई पड़ रही है, तब स्पष्ट उपसंहार तो यही है कि न केवल मेरा जीवन व्यर्थ गया, बल्कि समस्त पराक्रमों, समझ, विवेक, संघर्ष, सक्रियता, कर्मठता, तेजस्विता सात्विकता, साधकता व निरंतर संघर्षशीलता के बाद भी मैं अपने व्यक्तित्व को मनुष्यता माप की दृष्टि से पतन की खाई में गिरा दिया। आज देवव्रत, जीवन भर एक भीषण प्रतिज्ञा निभाकर, भले ही महाभारत युग का एक महान पात्र, वंदनीय भीष्म पितामह बन गया हो, किंतु सच्चाई यह है कि वह पापी पक्ष का साथ निभाकर स्वयं पापी बन गया है।

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