शेयर बाजार की उल्टी चाल

शेयर बाजार का कारोबार भी बड़ा अजीब है। दुनिया में किसी भी स्थान पर आर्थिक मोर्चे पर कोई दिक्कत आयी तो दुनिया भर के शेयर बाजारों पर इसका तुरंत असर दिखने लगता है। इस बार भी भारतीय शेयर बाजार अचानक धराशायी हो गया। वैसे पिछले दस वर्षों में शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव पर नजर रखने के बाद यह निष्कर्ष तो निकाला ही जा सकता है कि कागजी सौदों का यह कारोबार अत्यंत ही संवेदनशील है और दुनिया की चुनौतियों से बेहतर तरीके से निपटने में सक्षम भी नहीं है। यह तो भारतीय बचत पद्धति की अर्थव्यवस्था है, जो शेयर बाजार के हिचकोले खाने के बाद भी अपने तौर-तरीकों से संभलती रहती है। वैसे भारतीय शेयर बाजार को लोकप्रिय बनाने में पश्चिमी बाजारवाद की भी बड़ी भूमिका रही है। इस किस्म की उपभोक्तावादी अर्थव्यवस्था में शेयरों के उतार-चढ़ाव से निवेशकों की पूंजी का बढ़ना और घट जाना निर्धारित होता है। अब पड़ोसी देश चीन की अर्थव्यवस्था में आयी मंदी की वजह से भारत का शेयर बाजार अगर प्रभावित हो रहा है तो हमें इस सच को स्वीकार कर लेना चाहिए कि विदेशी निवेशकों के पूंजी निवेश से भारतीय शेयर बाजार अब भी जबर्दस्त तरीके से प्रभावित होता है। भारतीय शेयर बाजार ने पिछले एक दशक में इस किस्म के अनेक घटनाओं को देखा है, जिनमें भारतीय परिवेश अनुकूल होने के बाद भी शेयर बाजार में भारतीय निवेशकों के पैसे डूबे हैं। लिहाजा भारतीय अर्थव्यवस्था की बेहतर स्थिति के लिए शेयर बाजार को आधारभूत संकेत की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वैसे भी भारतीय शेयर बाजार भारतीय किसानों और मजदूरों के परिश्रम का संकेत नहीं देते। संभावित कारोबार के अनुमान पर होने वाले इस कारोबार के आकलनों के बार-बार सही साबित होने का कोई ठोस और विज्ञानसम्मत मापदंड भी नहीं है। ऐसे में शेयर बाजार के धराशायी होने की स्थिति में भारतीय निवेशकों का पैसा डूबना तय है। यह हर स्तर पर जांच का विषय है कि बार-बार के इस उठा-पठक से जहां भारतीय निवेशकों के पैसे डूबते हैं तो आखिर यह डूबा हुआ पैसा किनलोगों की जेबों में जाता है। शेयर बाजार सही अर्थों में किसी भी लिस्टेड कंपनी के कारोबार में होने वाले मुनाफे की संभावना के आधार पर कंपनी के शेयर का भाव निर्धारित करती हैं। अब यह उत्पादन किन्हीं कारणों से अगर नहीं हो पाया तो जाहिर है कि संभावित लाभ का हिस्सा भी घटता है। लिहाजा इस व्यवस्था को और विज्ञान सम्मत बनाने की आवश्यकता है क्योंकि बार-बार भारतीय निवेशकों का पैसा अगर इस कारोबार में डूबता रहा तो एक समय ऐसा भी आयेगा जब मध्यमवर्गीय भारतीय शेयर बाजार के कारोबार से खुद को अलग कर लेगा। और भारतीय मध्यमवर्ग के इस कारोबार से अलग हटते ही शेयर बाजार में पूंजी की कमी हो जाएगी। वर्तमान में भारतीय शेयर बाजार में बड़े निवेशकों के मुकाबले छोटे निवेशकों का पैसा ज्यादा लगा हुआ है। कंपनियों के कारोबार में यही पैसा बड़ी पूंजी के तौर पर काम आता है। इसलिए केंद्र सरकार को इस दिशा में गंभीर प्रयास करना चाहिए ताकि शेयर बाजार के धराशायी होने के पूर्व ही भारतीय निवेशकों को इसके संकेत मिल सकें और अचानक शेयर बाजार में आने वाली गिरावट को समय रहते रोका जा सके। इस व्यवस्था से कमसे कम भारत के छोटे निवेशकों को बार-बार होने वाले नुकसान से बचाया जा सकेगा और भारतीय शेयर बाजार पर विदेशी निवेशकों के परोक्ष नियंत्रण की स्थिति से भी पार पाया जा सकेगा। भारत के आर्थिक विशेषज्ञ लगातार इस बात की संभावना व्यक्त कर रहे हैं कि भारत का विकास दर चीन के मुकाबले बेहतर स्थिति में पहुंच रहा है। लिहाजा शेयर बाजार के धराशायी होने के बहाने भारतीय निवेशकों का पैसा डूबने से बचाने के लिए भी कोई बेहतर योजना बननी चाहिए ताकि आगे बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था में भारतीय मध्यमवर्ग के
पैसे सुरक्षित रह सकें और इन छोटे निवेशकों के पैसों से देश में होने वाला औद्योगिक विकास किसी भी कीमत पर प्रभावित नहीं हो। इस क्रम में अब सरकार को कागजी तौर पर शेयर बाजार में सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाली कंपनियों को भी उनकी वर्तमान स्थिति के आधार पर दर्ज करना चाहिए। इस बाजार में अब भी अनेक ऐसी कंपनियां हैं, जो व्यवहारिक तौर पर नकारा हो चुकी हैं और उनके अब भी शेयर बाजार में दर्ज होने का कोई औचित्य नहीं बचा है। ऐसी मृत कंपनियों को इस सूची से हटाकर सही तरीके से कंपनी और देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाली कंपनियों को आगे किया जाना चाहिए। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में कागजी रद्दी बनी कंपनियों का बोझ कम होगा और अर्थव्यवस्था के आंकड़े में मृत कंपनियों के आंकड़े फालतू का बोझ भी नहीं बनेंगे। कई अवसरों पर इस किस्म की कंपनियों के नाम पर भी शेयरों की खरीद बिक्री के खेल में करोड़ों-अरबों के वारे न्यारे हो जाते हैं। देश में इस गोरखधंधे को रोकने का यही सही समय है।

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