कुख्यातों को बिना जैमर वाली जेलों में भेजने की अफसरों की साजिश!

आम इन्सान में भले ही जेलों को लेकर खौफ होता हो और वह कारागारों को किसी सजायाफ्ता मुजरिम के लिए सबसे बड़ी सजा के तौर पर देखते हों, लेकिन सूबे के कुख्यातों, माफियाओं और बड़े मुजरिमों के लिए यह जेल किसी आरामगाह और ऐशगाह से कम नहीं हैं। कहने को जेल की ऊंची-ऊंची दीवारों के अन्दर ये अपराधी संगीनों के साये में रहते हैं और इनका बाहरी दुनिया से कोई सरोकार नहीं होता है, लेकिन हकीकत इससे ठीक उलट है। जेल के अन्दर न सिर्फ अपराधियों की सुख-सुविधा के पूरे इन्तजाम मौजूद हैं, बल्कि यह यहां से बाहर की दुनिया में अपना नेटवर्क भी बेहद आराम से चलाते रहते हैं। जेलों में हुई छापेमारी में बरामद प्रतिबन्धित चीजें अक्सर इसकी गवाही देती आयी हैं, लेकिन यह महज दिखावे से ज्यादा साबित नहीं होती, क्योंकि सियासत और अधिकारियों के संरक्षण में जेल के अन्दर हर वह गुनाह पलता है, जो बाहर की दुनिया को नजर नहीं आता। जेलों के अन्दर के इस स्याह सच को जानने के बाद ही यहां जैमर लगाने की शुरुआत हुई। माना जा रहा था कि जैमर लगने के बाद कुख्यातों का नेटवर्क टूट सकेगा और बाहर की दुनिया में जुर्म की दहशत कुछ कम होगी, लेकिन जैमर लगने के बाद भी अपराधियों का सलाखों के पीछे से वसूली, हत्या और अपहरण सहित अन्य गुनाहों का धंधा बदस्तूर जारी है। ऐसे में जब उत्तर प्रदेश में निजाम बदले तो जेल प्रशासन भी तेवर बदलने लगा। यही वजह है कि बीते चन्द दिनों में सूबे की जेलों में बन्द 30 शातिर अपराधियों और माफियाओं की जेल बदल दी गईं। हालांकि अदला-बदली के इस खेल में कई खामियां सामने आयी हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि शातिर अपराधियों को एक जेल से दूसरी जेल में शिफ्ट किया जाना कहीं सिर्फ दिखावा मात्र तो नहीं है? कहीं अपराधियों के सहारे अपनी हुकूमत चलाने वाले अफसर सरकार की आंखों में धूल झांकने की कोशिश तो नहीं कर रहे? ये सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि जेलों में बन्द कई नामी-गिरामी अपराधी अब बिना जैमर वाली जेलों में भेज दिये गये हैं। इनमें मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद और शेखर तिवारी सहित कई नाम हैं। इस पूरे मामले पर गहराई से नजर डालें तो जिन अपराधियों के लिये जेल पनाहगाह बन गईं, जिनके मंसूबों पर जेल के जैमर भी लगाम नहीं लगा पाये, अब उन पर जेल अधिकारी इतने मेहरबान हो गए हैं या फिर उन्हें इन अपराधियों के जुर्म नहीं करने पर इतना ऐतबार हो चुका है कि उन्हें बिना जैमर वाली जेल में रखा गया है। मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, उमेश उर्फ गोरा राय, सचिन पाण्डेय, नरवेन्द्र उर्फ फग्गू समेत 28 अपराधी जिन जेलों में भेजे गये, उनमें जैमर ही नहीं लगे हैं। यानी जेल अफसरों की मिलीभगत और जेब खर्च से उनके मंसूबे और परवान चढ़ने जा रहे हैं। देखा जाए तो यूपी में योगी सरकार बनते ही जेल में जो पहला बवाल हुआ, वह फर्रूखाबाद जेल के कैदियों ने किया। योगी के तेवरों से शासन-प्रशासन के अधिकारी पहले ही अवगत हैं, इसलिए इससे पहले कि उन पर नजर टेढ़ी हो, अफसरों ने अपनी कुर्सी बचाने के लिये प्रदेश की 71 जेलों में बन्द 30 खूंखार अपराधियों के जेल ट्रांसफर का फरमान जारी कर दिया। वहीं जेल के अन्दर से अपराधी और माफिया मोबाइल नहीं चला सके, इसके लिये प्रदेश की 12 जेलों मुजफ्फरनगर, वाराणसी, मिर्जापुर, आगरा, सुल्तानपुर, मेरठ, लखनऊ, गाजियाबाद, नैनी सेन्ट्रल जेल, इलाहाबाद जिला कारागार, नोएडा, गोरखपुर और प्रतापगढ़ जिला जेल में जैमर लगाए गये हैं, बाकी की 59 जेलों में जैमर लगना बाकी है। यानी कागजी तौर पर देखा जाये तो इन्ही 12 जेलों में मोबाइल चलाना नामुमकिन होगा, लेकिन अधिकारियों ने अतीक अहमद को देवरिया, मुख्तार अंसारी को बांदा, उमेश उर्फ गोरा राय को रामपुर जेल, शेखर तिवारी महाराजगंज जेल, यूनुस काला बलिया जेल भेजा

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