• आस्था का नया रुप दिखता है वर्धवान के कोलसरा गांव में
  • किसी घर में नहीं होती माता की मूर्ति
  • त्रिशूल को तोड़कर बनायी गयी थी प्रतिमा

एजेंसियां
बर्धवान : देश में ऐसे भी श्रद्धालु हैं, जो पूजा के बाद प्रतिमा के टुकड़े टुकड़े कर उसे विसर्जित करते हैं। ऐसा उनकी अपनी पारंपरिक और प्राचीन धार्मिक मान्यताओं की वजह से होता है।
पूर्व बर्दवान स्थित जामालपुर कोलसरा ग्राम में मां काली को टुकड़े-टुकड़े करके उनका विसर्जन किया जाता है।
यहां एक सौ से अधिक घर हैं, लेकिन किसी भी घर में मां की मूर्ति नहीं है।
क्योंकि सभी गांव के लोग माता सिद्धेश्वरी मन्दिर में पूजा करने जाते हैं। ये सभी लोग माता के श्रद्धालु ही है। अपनी प्राचीन धार्मिक मान्यता की वजह से सभी श्रद्धालु इस परिपाटी का पालन करते आ रहे हैं।
यही कारण है कि कोलसरा में मां काली का कोई मन्दिर नहीं है।

वर्ष 2017 में काली पूजा के 478 साल पूरे होंगे। बांग्ला पंचांग के अनुसार यह वर्ष 1540 है।

श्रद्धालु की इस आस्था के पीछे क्या है किंवदंति

कहते हैं जब ग्राण्ड ट्रक रोड का निर्माण हो रहा था तो उस समय रोड बनवाने का कार्यभार दिगम्बर घोषाल नामक व्यक्ति के पास था।
वे राज्य की सभी सड़कों का मुआयना करते थे। घोषाल बाबू सुबह-सुबह जमालपुर की कंसा नदी के पार भी आवाजाही करते रहते थे।
एक रोज उन्होंने नदी के किनारे पूरी रात बिताई थी। उस रात उनके सपने में मां सिद्देश्वरी देवी ने आदेश दिया कि कंसा नदी के किनारे मन्दिर बनवाओ।

शेरशाह सूरी ने दी थी जमीन

घोषाल बाबू ने यह बात तत्कालीन राजा शेरशाह सूरी से बताई। राजा ने देवी सिद्धेश्वरी का मन्दिर बनवाने का निर्देश दिया।
राजा शेरशाह सूरी ने राजस्व से कोलसरा गांव को 500 बीघा जमीन उपलब्ध कराई।

आज भी कोलसरा गांव में मां सिद्धेश्वरी का मन्दिर श्मशान घाट के करीब स्थित है।
यहां पंचमुंड के ऊपर मां सिद्धेश्वरी की मूर्ति स्थापित की गई है। वर्तमान समय में कंसा नदी घाटी में बदल चुकी है।
किंवदंति है कि मां सिद्धेश्वरी की मूर्ति एक त्रिशूल को तोड़कर बनाया गया था, इसलिए यहां काली पूजा के बाद
मां सिद्धेश्वरी के टुकड़े-टुकड़े करके विसर्जन किया जाता है।

दिगम्बर घोषाल के वंशज तथा शिक्षक समीर घोषाल के अनुसार,
माता सिद्धेश्वरी की मूर्ति एक त्रिशूल को तोड़कर बनाया गया था।
इसीलिए यहां आज भी मां काली की पूजा के बाद माता सिद्धेश्वरी को टुकड़े-टुकड़े करके विसर्जन किया जाता है।
वर्ष 1829 तक यहां घोषाल बाड़ी नाम से पूजा आयोजित की जाती थी। सन् 1830 में बदलाव किया गया
और यहां घोषाल बाड़ी की पूजा सार्वजनिक पूजा के रूप में आयोजित की जाने लगी।
काली पूजा के अवसर पर पूरे गांव में सिर्फ मां सिद्धेश्वरी की ही पूजा की जाती है।
अन्य किसी काली की पूजा नहीं की जाती।
इसके अलावा कोलसरा गांव के किसी भी घर में मां काली का कलेन्डर या फोटो भी रखना वर्जित है।

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